हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , लखनऊ: रमज़ान-उल-मुबारक के आखिरी जुमा को 'विश्व कुद्स दिवस' के अवसर पर मजलिस उलमा-ए-हिंद की ओर से फिलिस्तीन की आज़ादी, पहले किबला (बैतुल मुकद्दस) की वापसी, गाजा, लेबनान और यमन के मज़लूम लोगों के समर्थन और इसराइल व अमेरिका के आतंकवाद के खिलाफ नमाज़-ए-जुमा के बाद मौलाना कल्बे जवाद नकवी के नेतृत्व में आसफी मस्जिद में विरोध प्रदर्शन हुआ।
पहले मौलाना कल्बे जवाद नक़वी की इमामत में नमाज़ अदा की गई, उसके बाद नमाज़ी बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन करते हुए बड़े इमामबाड़े के चबूतरे पर एकत्र हुए। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने फिलिस्तीन की आज़ादी और पहले किबला की वापसी की मांग की।
प्रदर्शनकारियों ने आयतुल्लाह ख़ामेनेई की मज़लूमाना शहादत को याद करते हुए उनके कातिलों के खिलाफ 'मर्दाबाद' के नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों ने सामूहिक रूप से ईरान के नवनिर्वाचित रहबर-ए-इंक़िलाब आयतुल्लाह-उल-उज़्मा सैयद मुज्तबा ख़ामेनेई से फिर से निष्ठा का वचन भी लिया। प्रदर्शन के अंत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के चित्रों को आग के हवाले कर प्रदर्शनकारियों ने अपना गम और गुस्सा जाहिर किया। प्रदर्शन में बड़ी संख्या में मोमिनीन व मोमिनात ने भाग लिया।
प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए मजलिस उलमा-ए-हिंद के जनरल सेक्रेटरी और इमाम-ए-जुमा मौलाना कल्बे जवाद नकवी ने कहा कि इसराइल ने गाजा और फिलिस्तीन के लोगों पर जितना अत्याचार किया है, उसकी मिसाल इस सदी में नहीं मिलेगी।
इसराइल गाजा में नरसंहार का दोषी है, मगर अफसोस दुनिया खामोश दर्शक है। मौलाना ने कहा कि इसराइल और अमेरिका ने हमेशा आतंकवाद को बढ़ावा दिया। अमेरिका ने ईरान में जिस तरह मनाब के एक स्कूल पर हमला करके सैकड़ों बच्चियों को शहीद किया, उससे पता चलता है कि महिला अधिकारों के नारे लगाने वाली ये सभी सरकारें खुला फर्ज़ीवाड़ा करती हैं।
मौलाना ने कहा कि अफसोस हमारे देश भारत ने भी मासूम बच्चियों के स्कूल पर हुए हमले की निंदा नहीं की। मौलाना ने कहा कि हमारा सिर शर्म से झुक गया क्योंकि भारतीय सरकार ने रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी आयतुल्लाह ख़ामेनेई की शहादत पर शोक संवेदना भी पेश नहीं की।
उन्होंने कहा कि हमारी सरकार को याद रखना चाहिए कि अमेरिका और इसराइल कभी किसी के सच्चे दोस्त नहीं हो सकते। ये इंसानियत के मुजरिम (अपराधी) और कातिल हैं।
मौलाना ने कहा कि ईरान ने मुस्लिम देशों में अमेरिकी अड्डों और सैन्य केंद्रों पर हमला किया है। ये मुस्लिम सरकारें नहीं बल्कि अमेरिका और इसराइल की गुलाम सरकारें हैं जिन्होंने हमेशा उम्मत-ए-मुस्लिमा के हितों के खिलाफ काम किया। लेकिन अरब जनता अब जाग चुकी है और बहुत जल्द अरब देशों में इंक़िलाब होगा।
मौलाना ने कहा कि ट्रंप ने जंग तो शुरू कर दी मगर अब भागने के लिए रास्ता नहीं मिल रहा है। मौलाना ने कहा कि ईरान की कौम कर्बला की पैरो है, इसलिए वह कभी जालिमों अत्याचारियों के आगे सिर नहीं झुका सकती। उन्होंने कहा कि ईरान ने पूरी दुनिया में कर्बला को पहचान दिलाई है। उन्होंने कहा कि हम दुआ करते हैं कि कुद्स दिवस के मौके पर यह आखिरी विरोध प्रदर्शन हो और अगली जुमातुल विदा की नमाज बैतुल मुकद्दस में अदा की जाए।
मौलाना सईदुल-हसन नक़वी ने कहा कि इमाम खुमैनी (रह.) ने इंक़िलाब-ए-इस्लामी की सफलता के बाद यह एलान किया था कि फिलिस्तीन की आज़ादी और पहले किबला की वापसी के लिए रमज़ान के आखिरी जुमा को 'यौम-उल-कुद्स' (कुद्स दिवस) के तौर पर मनाया जाए। आज हम इसी लिए यहां विरोध के लिए एकत्र हुए हैं।
मौलाना ने कहा कि कल तक जो लोग मज़लूम फिलिस्तीनियों पर हमला कर रहे थे, आज वे चूहों की तरह बंकरों में छिपे हुए हैं। फिलिस्तीनी हमेशा मैदान में रहे। उन्होंने बारूद का मुकाबला ईंटों और पत्थरों से किया। लेकिन ये मज़लूमों पर जुल्म करने वाले आज बंकरों में दुबके हुए हैं। मौलाना ने कहा कि शहीद का खून राइगां (बेकार) नहीं जाता, रहबर-ए-इंक़िलाब और कुद्स के शहीदों का खून रंग ला रहा है।
मौलाना अली अब्बास खान ने कहा कि शहीद की ताकत शहादत के बाद और बढ़ जाती है, इस हकीकत का अंदाजा दुश्मन को नहीं था। उन्होंने कहा कि रहबर-ए-इंक़िलाब की शहादत पर हर इंसान ने आंसू बहाए क्योंकि रहबर-ए-इंक़िलाब की शख्सियत ईरान तक महदूद नहीं थी। मौलाना ने कहा कि हमें शहीदों से सबक लेना चाहिए कि किस तरह उन्होंने जुल्म के खिलाफ मुकाबला किया और इंसानियत के लिए अपनी जानों का नज़राना पेश किया।
मौलाना ने कहा कि अब वह दिन दूर नहीं जब पूरी दुनिया में इंसाफ (न्याय) का परचम लहराएगा। उन्होंने कहा कि पहले किबला पर हमारा पहला हक है जिससे हम कभी हाथ नहीं खींच सकते, यही एलान इमाम खुमैनी (रह.) का था और इसी राह में आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने अपनी शहादत पेश की।
मौलाना मुशाहिद आलम रिज़वी ने कहा कि यौम-उल-कुद्स दरअसल मज़लूमों और कमजोरों का दिन है। आज का दिन मज़लूम फिलिस्तीनियों के लिए और गाजा के मासूम बच्चों और बहादुर माओं को श्रद्धांजलि पेश करने का है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी ताकतों के चेहरे पर पड़ा हुआ अमन का नकाब उतर गया है। यह नकाब आयतुल्लाह ख़ामेनेई की शहादत ने जालिमों के चेहरे से नोच दिया।
ये लोग बातचीत के बहाने फर्ज़ीवाड़ा देते हैं। उन्होंने कहा कि यह हमला ईरान और आयतुल्लाह ख़ामेनेई पर नहीं बल्कि इंसानियत पर था। दुनिया में एक इंसान भी ऐसा नहीं है जो मज़लूमों के लिए बोलने की जुर्रत कर सके। तन्हा रहबर-ए-इंक़िलाब-ए-इस्लामी थे जो मज़लूमों की हिमायत और जालिमों के खिलाफ बोलते थे।
आज दुनिया के बड़े-बड़े लीडर एपस्टीन फाइल्स के डर से चुप हैं क्योंकि वे इंसानियत के मुजरिम (अपराधी) हैं। मौलाना ने कहा कि अमेरिका और इसराइल को शिकस्त हो चुकी है और अब वे युद्धविराम के लिए फरियाद कर रहे हैं।
विरोध प्रदर्शन में मौलाना सैयद कल्बे जवाद नकवी, मौलाना अली अब्बास खान, मौलाना सईद-उल-हसन नकवी, मौलाना शाहनवाज हैदर, मौलाना नज़र अब्बास, मौलाना फैज़ अब्बास मशहदी, मौलाना अबुल फज़ल आबिदी, मौलाना वसी आबिदी, मौलाना मुशाहिद आलम रिज़वी, मौलाना फिरोज हुसैन, मौलाना शबाहत हुसैन, मौलाना ज़व्वार हुसैन, डॉक्टर हैदर मेंहदी, मौलाना मंज़र अब्बास, मौलाना तहज़ीबुल-हसन और मौलाना हसनैन बाकिरी उपस्थित रहे।
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